बलौदा बाजार Baloda Bazar | CG 22 बलौदाबाजार जिला की स्थापना 1905 ई. में हुई थी। यह जिला रायपुर जिला मे शामिल था। 2012 मे यह पृथक जिला बना।
जिला - बलौदा बाजार
स्थापना - 1 जनवरी 2012
क्षेत्रफल - 4676 वर्ग किलोमीटर
जनसंख्या 2011 - 1305343
तहसील (7) 1. सिमगा, 2. भाटापारा, 3. बलौदाबाजार, 4. कसडोल, 5. बिलाईगढ़, 6. पलारी, 7. लवन
विकासखण्ड (6) 1. सिमगा, 2. भाटापारा, 3. बलौदाबाजार, 4. कसडोल, 5. बिलाईगढ़, 6. पलारी
नगर पालिका - 3
नगर पंचायत - 7
ग्राम पंचायतें - 495
सीमावर्ती जिले (7) 1. रायपुर, 2. बेमेतरा, 3. मुंगेली, 4. बिलासपुर, 5. जांजगीर-चांपा, 6. रायगढ़, 7. महासमुंद
नगर पालिका परिषद (2) 1. भाटापारा, 2. बलौदाबाजार
विधानसभा क्षेत्र (4) 1. भाटापारा, 2. बलौदाबाजार, 3. कसडोल, 4. बिलाईगढ़ (SC)
राष्ट्रीय राजमार्ग NH 130 B (रायपुर-बलौदाबाजार)
पिनकोड 493332 (बलौदाबाजार)
आधिकारिक वेबसाइट balodabazar.gov.in
Baloda Bazar Chhattisgarh बलौदा बाजार छत्तीसगढ़
बलौदा बाजार का नामकरण यहाँ पुराने समय मे लगने वाले बैलो के बड़े बाजार की वजह से हुआ।संत बाबा गुरुघासीदास का जन्म जिले के गिरौदपुरी मे 18 दिसम्बर 1756 में हुआ था।
यहाँ राज्य शासन ने 172 मीटर ऊंचा जैतखंभ का निर्माण कराया है। सन् 1857 की क्रांति के प्रथम शाहिद वीर नारायण सिंह बलौदा बाजार के सोनाखान क्षेत्र के थे।
जिले के बारे में About the District Baloda Bazar
बलौदाबाजार-भाटापारा जिले की स्थापना 01.01.2012 को हुआ । यह मूल रुप रायपुर जिला से विभाजित होकर बना है ।
बलौदा बाजार नगर की भौगोलिक स्थिति 21.300 54′ से 31.450 14′ उत्तरी अक्षांश तथा 42.020 17′ से 82.290 07′ पूर्वी देशांतर के मध्य समुद्र तल से 270मी. की ऊंचार्इ पर स्थित है।
रायपुर संभाग में स्थित बलौदा बाजार जिले की सीमा बेमेतरा, मुंगेली, बिलासपुर, जाजगीर, रायगढ़, महासमुंद, व रायपुर जिले को स्पर्श करती है।
बलौदा बाजार का नामकरण के संबंध में प्रचलित किवदंती अनुसार पूर्व में यहॉ गुजरात, हरियाणा, महाराष्ट्र, उड़ीसा, बरार आदि प्रांतों के व्यापारी बैल, भैंसा (बोदा) का क्रय विक्रय करने नगर के भैंसा पसरा में एकत्र होते थे। जिसके फल स्वरूप इसका नाम बैलबोदा बाजार तथा कालांतर में बलौदा बाजार के रूप में प्रचलित हुआ।
इतिहास History Baloda Bajar
अंग्रेजी हुकुमत के दौरान 1854 से 1864 तक बलौदा बाजार व तरेंगा (भाटापारा) रायपुर जिले का अंग थे । पश्चात 1864 में इन इलाकों को बिलासपुर जिले में शामिल कर लिया गया।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से उत्पन्न हो रही दिक्कतों के पश्चात दूरदर्शिता पूर्वक अंग्रेज अधिकारियों के द्वारा 1903 में सिमगा स्थित तहसील मुख्यालय को बलौदा बाजार में स्थानांतरित कर इसे जिला का दर्जा दिया गया।
उस वक्त से ही विकासखंड सिमगा, भाटापारा, बलौदा बाजार, पलारी, कसडोल व बिलाईगढ़ इसके अतर्गत शामिल थे। जिन्हें 1982 में पृथक तहसील का दर्जा दिया गया।
प्रशासनिक दृष्टिकोण से अंग्रेजों द्वारा बलौदा बाजार से 2 किमी दूर स्थित ग्राम परसाभदेर (मिशन) में विश्राम गृह, चर्च, अस्पताल व निवास निर्मित कराया गया।
1920 में सेनीटेशन एक्ट लागू कर बलौदा बाजार में पंचायत का गठन किया गया। स्वतंत्रता पश्चात 1949 में स्थानीय शासन अधिनियम के तहत बलौदा बाजार को ग्राम पंचायत बनाया गया।
पश्चात 1955 में ग्राम पंचायत हेतु आम चुनाव कराये गये जिनमें से 11 कांग्रेस के तथा 4 प्रजा सोसलिस्ट पार्टी के सदस्य चुनकर आये। क्षेत्रीय व्यवस्था संचालन हेतु गठित लोकल बोर्ड स्वतंत्रता पश्चात 1947 में जनपद सभा के रूप में परिवर्तित हो गया।
1952 मे भाटापारा-सीतापुर द्विसदस्यीय विधानसभा में बाजीराव बिहारी व चक्रपाणी शुक्ल, 1957 में बलौदा बाजार द्विसदस्यीय विधानसभा में नैनदास तथा बृजलाल वर्मा विजयी हुए।
पश्चात 1962 में मनोहर दास, 1963 के उपचुनाव व 1967 के चुनाव में बृजलाल वर्मा, 1972 में दौलत राम वर्मा, 1977 में वंशराज तिवारी, 1980 में गणेश शंकर वाजपेयी,
1985 में नरेन्द्र मिश्रा, 1990 में सत्यनारायण केशरवानी, 1993 में करूणा शुक्ला, 1998 व 2003 में गणेश शंकर वाजपेयी तथा 2008 में श्रीमती लक्ष्मी बघेल विधायक पद पर सुशोभित हुईं।
1952 के प्रथम आम चुनाव में रायपुर, बिलासपुर, दुर्ग को शामिल कर द्विसदस्यीय लोकसभा सीट से भूपेन्द्रनाथ मिश्र व आगमदास विजयी हुए।
पश्चात 1957 में द्विसदस्यीय बलौदा बाजार लोकसभा सीट पर विद्याचरण शुक्ल व मिनीमाता को निर्वाचित घोषित किया गया। पश्चात रायपुर लोकसभा अंतर्गत शामिल कर लिया गया। 1973 में बलौदा बाजार को नगर पालिका का दर्जा दिया गया।
यातायात सुविधा Transport Facility in Baloda Bazar
जिले में यातायात का प्रमुख साधन सड़क मार्ग है। जिले की भाटापारा तहसील में रेल सुविधा उपलब्ध है। राष्ट्रीय राजमार्ग सिमगा तहसील में सिमगा से लिमतरा तक गुजरता है। जबकि राज्यमार्ग क्रमांक 9 (रायपुर से कोरबा) का 79.4 कि.मी. भाग इस जिले से गुजरता है।
वहीं राज्य मार्ग क्रमांक 10 (कोटा से बलौदा बाजार) का 42 कि.मी., राज्य मार्ग क्रमांक 13 (पामगढ़ से सोहेला उडि़सा सीमा) का 42 कि.मी., राज्य मार्ग क्रमांक 14 (पिथौरा से कसडोल) का 46 कि.मी., राज्य मार्ग क्रमांक 16 (झिलमीली से पदमपुर सरायपाली) का 9.2 कि.मी. व राज्य क्रमांक 20 (तिल्दा से मगरलोड) का 15.3 कि.मी. भाग बलौदा बाजार जिले से गुजरता है।
जिला मार्गों में लवन-खरतोरा 40.6 कि.मी., बलौदा बाजार-रिसदा-हथबंध 48.6 कि.मी., भाटापारा-निपनिया 47.6 कि.मी., भाटापारा-जरौद-सुहेला 28.8 कि.मी. के अलावा कुछ प्रमुख मार्ग बड़े ग्रामों से जुडे़ हुये हैं।
आवागमन के दृषिटकोंण से बलौदा बाजार जिले से रायपुर मार्ग पर प्रतिदिन 90 बसें (टार्इमिंग), भाटापारा मार्ग पर 30, गिधौरी-बिलार्इगढ़ -भटगांव-सरसीवां-सारंगढ़ मार्ग पर 60,
सिमगा-सुहेला मार्ग पर 10, बिलासपुर मार्ग पर 15, बसना, पिथौरा मार्ग पर 2-2, आरंग मार्ग पर 5 व कोरबा मार्ग पर 1 बस संचालित होती है। इसके अलावा रायपुर-झारसुगडा व्हाया बलौदा बाजार रेलमार्ग को 12वी योजना में शामिल किया गया है।
सीमेंट उद्योग – Cement Industry
1) लाफाज सीमेंट कंपनी II – सोनाडीह
2) अल्ट्राटेक सीमेंट कंपनी – हिरमी
3) ग्रासीम सीमेंट कंपनी – रावन
4) अम्बुजा सीमेंट कंपनी – रवान
निवासरत प्रमुख जनजाति Major Tribes Residing in BalodaBazar
1. बिंझवार
2. सवरा
3. कोंध
4. परधान
केन्द्र संरक्षित स्मारक Centrally Protected Monuments
1. महादेव मंदिर, नारायणपुर (बलौदाबाजार) Mahadev Mandir
सिरपुर मार्ग पर ग्राम ठाकुरिया से 8 कि.मी. दूर नारायणपुर नामक गाँव में एक प्राचीन शिव मंदिर स्थित है, जिसे महादेव मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
यह मंदिर महानदी के सुरम्य तट पर स्थित है। मंदिर पूर्वाभिमुखी है एवं एक चबूतरे पर स्थित है। इसका निर्माण बलुआ पत्थरों से 11वीं-12वीं शताब्दी में किया गया है।
2. आदित्य को समर्पित मंदिर (बलौदाबाजार) राज्य संरक्षित स्मारक
1. सिद्धेश्वर मंदिर (पलारी) Siddheshwar Mandir Palari
सिद्धेश्वर मंदिर बलौदाबाजार से 25 कि.मी. दूर ग्राम पलारी में बालसमुंद तालाब के तटबंध पर स्थित है। इस मंदिर का निर्माण लगभग 7-8वीं शती में हुआ था।
ईंट से निर्मित यह मंदिर पश्चिमाभिमुखी है। इस मंदिर के द्वार पर नदी देवी गंगा एवं यमुना का चित्रण त्रिभंगमुद्रा में और सिरदल पर त्रिदेवों का अंकन किया गया है।
इस मंदिर के प्रवेश द्वार पर स्थित सिरदल में शिव विवाह का चित्रण है एवं द्वार शाखा पर अष्ट दिक्पालों का अंकन मिलता है।
मंदिर के गर्भगृह में सिध्देश्वर नामक शिवलिंग प्रतिष्ठापित है। वर्तमान छत्तीसगढ़ में ईंट से निर्मित मंदिरों में इस मंदिर का नमूना उत्तम है। यह स्मारक छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा संरक्षित है।
2. चितावरी देवी मंदिर (धोबनी) Chitavari Devi Mandir (Dhobani)
चितावरी देवी मंदिर रायपुर नगर से 57 कि.मी. दूर स्थित दामाखेड़ा नामक प्रसिद्ध स्थल (जहां पर कबीर पंथी गुरूओं की गद्दी स्थापित है) से 2 किलोमीटर की दूरी पर धोबनी नामक गांव में तालाब के किनारे प्रस्तर और ईंट से निर्मित है।
ऊंची जगती पर निर्मित यह मंदिर मूलतः शिवमंदिर है जिसके गर्भगृह का परवर्ती मध्यकाल में जीर्णोद्धार किया गया। मंदिर के गर्भगृह में रखी विरुपित प्रतिमा चितावरी देवी के रूप में पूजित है।
ईंट निर्मित ताराकृति वाले मंदिरों का यह सुन्दर उदाहरण है। जो 8-9वीं शती ईस्वी में निर्मित है। यह स्मारक छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा संरक्षित है।
3. प्राचीन शिव मंदिर (डमरू) Prachin Shiv Mandir (Damaru) Baloda Bajar
डमरू गांव के बाहर प्रस्तर से निर्मित, पूर्वाभिमुखी, जर्जर स्थिति में एक शिवमंदिर स्थित है। वर्तमान में इसका गर्भगृह रिक्त है। इस मंदिर के अतिरिक्त परिसर में दो लघु टीले विद्यमान हैं।
इस शिव मंदिर परिसर में ही उत्खनित त्रिविक्रम, ब्रम्हा, विष्णु, शिव – पार्वती, सूर्य, यम चामुण्डा, अम्बिका, चंवरधारिणी की प्रतिमायें और कुछ मिथुन प्रतिमायें, नवनिर्मित महामाया देवी के मंदिर की भित्तियों में जड़ी हैं।
उक्त प्राचीन मंदिर लगभग 12 वीं शती ईस्वी की हैं जो समकालीन वास्तु शिल्प एवं मूर्तिविद्या का अच्छा उदाहरण है।
4. मावली देवी मंदिर (तरपोंगा) Maavali Devi Mandir (Tarponga)
मावली देवी मंदिर छत्तीसगढ़ राज्य के बलौदाबाजार जिले में रायपुर से 62 कि.मी. तथा रायपुर-बिलासपुर रोड पर स्थित विश्रामपुर से 3 कि.मी. की दूरी पर स्थित तरपोंगा ग्राम में शिवनाथ नदी के दक्षिण तट पर स्थित है।
वास्तव में यह प्राचीन ध्वस्त मंदिर स्थली है जहां पर ग्रामीणों ने नया मंदिर निर्मित कर दिया है, एवं पुरानी द्वार चौखट और कुछ मूर्तियों को मण्डप में दीवारों से जड़ दिया है। वर्तमान में यह मंदिर ‘मावली देवी’ अथवा ‘मावली माता‘ के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है।
महिषासुरमर्दिनी की प्रतिमा यहां मावली माता के रूप में पुज्यनीय है। मावली माता का यह स्वरूप छत्तीसगढ़ में अधिक लोकप्रिय है। इस मंदिर की प्राचीन द्वार चौखट अलंकृत है।
इसकी बायीं द्वारशाखा पर नदी देवी यमुना एवं दायीं द्वार शाखा पर नदी देवी गंगा खड़ी है। दीवार पर जड़ी हुई प्रतिमाओं में चतुर्भुजी विष्णु, महिषासुर मर्दिनी एवं उमा महेश्वर की प्रतिमायें महत्वपूर्ण है।
शिवलिंग, नन्दी प्रतिमाएं, सती स्तंभों एवं योध्दा प्रतिमाओं का यहां पर अच्छा संग्रह देखा जा सकता है। इस मंदिर की द्वार चौखट एवं मंडप की प्रतिमायें 11-12वीं शती की है,
किन्तु शेष योद्धा प्रतिमायें एवं अन्य वास्तुखण्ड जो मंदिर की बाह्यभित्ति के सहारे टिकाकर रखे गये हैं, वे 16-17वीं शती ईस्वी के हैं। पुरातत्वीय दृष्टि से यह संग्रह महत्वपूर्ण है। यह स्मारक छत्तीसगढ़ राज्य द्वारा संरक्षित है।
पर्यटन स्थल Tourist Spots in Baloda bajar
1. दामाखेड़ा (बलौदाबाजार) Damakheda Balodabazar
कबीर पंथियों का धर्मस्थली “दामाखेड़ा” प्रसिद्ध धार्मिक स्थल है। यह स्थल बलौदाबाजार जिले में शिवनाथ नदी के तट पर स्थित है। यह कबीर पंथियों की नाम, महिमा वाली शाखा का केन्द्र है। यहां बाबा उग्रनाम साहब का मठ दर्शनीय है।
संत समागम मेले का भीड़ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा को देखा जाता है। विद्वान, श्रद्धालु तथा भक्तगण गुरू चरणों में श्रद्धा अर्पित कर आर्शीवाद प्राप्त करते हैं।
2. गिरौदपुरी धाम Girodpuri Dham Balodabazar
बलौदाबाजार से 40 किमी दूर तथा बिलासपुर से 80 किमी दूर महानदी और जोंक नदियों के संगम से स्थित, गिरौदपुरी धाम छत्तीसगढ़ के सबसे सम्मानित तीर्थ स्थलों में से एक है।
इस छोटे से गांव, जिसमें आध्यात्मिकता और ऐतिहासिक हित के गहरे संबंध है, छत्तीसगढ़ के सतनामी पंथ के संस्थापक, गुरु घासीदास जी का जन्म स्थान है।
कहा जाता है कि उन्होंने औरा-धौरा वृक्ष के नीचे लंबे समय तक तपस्या की है जो अभी भी वहां है। इस पवित्र स्थान को तपोभूमि भी कहा जाता है। यहां चरन कुंड और प्राचीन अमृत कुंड स्थित है, प्राचीन अमृत कुंड का पानी मीठा माना जाता है।
3. छातापहाड़ (गुरू घासीदास को ज्ञानप्राप्ति स्थल)
बलौदाबाजार के सोनाखान में छातापहाड़ अवस्थित है। वास्तव यह एक बहुत बड़ी शिला है, जहाँ सतनाम धर्म के प्रवर्तक गुरू घासीदास जी ने तप कर सिद्धि प्राप्त किया था।
4. भंडारपुरी Bhandarpuri Balodabazar
भंडारपुरी गुरू घासीदास जी की कार्य स्थली है। जहां इन्होंने सामाजिक क्रांति के माध्यम से समग्र छ.ग. में सतनामी संप्रदाय को विस्तारित किया।
5. तुरतुरिया Turturiya Balodabazar
महर्षि वाल्मिकी की पुण्य स्थली तुरतुरिया प्रसिद्ध ऐतिहासिक, धार्मिक नगरी है। यह स्थल बलमदेई नदी के तट पर स्थित है। बौद्ध विहार के प्राचीन अवशेष एवं मूर्तियों के लिए यह स्थान ख्याति प्राप्त है।
लव-कुश की जन्मस्थली होने का गौरव तुरतुरिया को जाता है। कुछ ही दूरी पर बारनवापारा अभ्यारण्य, यहाँ की प्राकृतिक सौंदर्यता को बढ़ाती है। महर्षि वाल्मिकी का आश्रम दर्शनीय है। छेरछेरा के अवसर पर यहां भव्य मेला लगता है।
6. बारनवापारा वन्यजीव अभ्यारण्य Baranwapara Wildlife Sanctuary Balodabazar
गठन – 1976 (वन्यजीव संरक्षण अधि. 1972 के तहत)
क्षेत्रफल – 245
चीतल, हिरण, बंदर आदि शाकाहारी जानवर सर्वाधिक
साँप सर्वाधिक | अन्य- बाघ, तेंदुआ, भालू, चिंकारा
तुरतुरिया आश्रम स्थित
इसके बीच से बलमदेई नदी गुजरती है।
इसमें देवधारा जलप्रपात स्थित है।
दर्शनीय स्थल- देवधारा जलप्रपात, छाता पथरा, तुरतुरिया, सिद्धखोल, मातागढ़ आदि।
7. सोनबरसा नेचर सफारी Sonbarsa Nature Safari Balodabazar
जिला मुख्यालय से महज 3 कि.मी. दूर ग्राम पंचायत लटुआ स्थित सोनबरसा रिजर्व फॉरेस्ट को नेचर सफारी के रुप में विकसित किया गया है। इसमें डियर पार्क भी स्थित है ।
इस जंगल सफारी में लोगों को जिप्सी से भ्रमण करने की सुविधा है । यहाँ पर साइकिलिंग का मजा भी लिया जा सकता है। बच्चों के मनोरंजन के साथ ही पिकनिक मनाने की भी अच्छी जगह वन विभाग द्वारा बनाई गई है।
8. पर्यटन, संस्कृति और भाषा Tourism, Culture and Language Balodabazar
पर्यटन की दृष्टि से बलौदाबाजार जिला अत्यन्त समृद्ध है। कसडोल में बारनवापारा अभ्यारण्य, तुरतुरिया (वाल्मिकी आश्रम), गिरौदपुरी में सतनाम पंथ के प्रर्वतक गुरू घासीदास की जन्म भूमि तथा यहां पर कुतुबमीनार से ऊंचा जैतखम्भ,
स्वतंत्रता संग्राम सेनानी वीर नारायण सिंह की जन्म भूमि, सोनाखान, पलारी के बालसमुंद तालाब के किनारे सिद्धेश्वर महादेव मंदिर, लवन के चंगोरी परिसर में शिवनाथ, महानदी व लीलागर नदी का संगम, सिमगा के सोमनाथ में शिवनाथ व खारून नदी का संगम प्रमुख स्थल है।
जिले की मूल भाषा हिन्दी व छत्तीसगढ़ी है तथा प्राचीन परम्पराओं व संस्कृति का दर्शन यहां के सुआ, राऊत नांचा, कर्मा, पंथी, गौरा-गौरी पूजन आदि में दृषिटगोचर होता है।
प्रमुख व्यक्तित्व परिचय Important Personality Introduction Balodabazar
1. गुरू घासीदास (1756-1836) Guru Ghasidas
छत्तीसगढ़ की संत परम्परा में गुरू घासीदास का नाम सर्वोपरि है। इनका जन्म 18 दिसम्बर 1756 को बलौदाबाजार जिले के गिरौदपुरी में हुआ था। माता का नाम अमरौतिन बाई तथा पिता का नाम महंगूदास था।
बाल्यकाल से ही हृदय में वैराग्य का भाव प्रस्फुटित था। समाज में व्याप्त पशुबलि तथा अन्य कुप्रथाओं का बचपन से ही विरोध करते रहे, समाज को नई दिशा प्रदान करने में अतुलनीय योगदान रहा है। सत्य से साक्षात्कार करना जीवन का लक्ष्य था।
वैराग्य प्रवृत्ति के साथ गृहस्थ कर्त्तव्यों का भार वहन करते हुए, अंधविश्वास से जकड़े, विषमताग्रस्त समाज के संबंध में विचार प्रवाह यथावत रहा, अंततः पुरी जाते हुए सारंगढ़ के पास आत्मबोध हुआ,
और यात्रा स्थगित कर ग्राम गिरौद के समीप छातापहाड़ पर औरा-धौरा वृक्ष के नीचे तपस्या कर सतनाम को आत्मसात् किया। इस विलक्षण अनुभूति से जन-जन को सत्य से परिचित कराने के लिए अग्रसर हो गए।
भंडारपुरी आकर सतनाम का उपदेश निरंतर देने लगे, सात वचन सतनाम पंथ के सप्त सिद्धांत के रूप में प्रतिष्ठित हुआ, जिसमें सतनाम पर विश्वास, मूर्ति पूजा का निषेध,
वर्ण भेद से परे, हिंसा का विरोध, व्यसन से मुक्ति, परस्त्रीगमन की वर्जना और दोपहर में खेत न जोतना है। आपके उपदेशों से समाज के असहाय लोगों में आत्मविश्वास, व्यक्तित्व की पहचान और अन्याय से जूझने की शक्ति का संचार हुआ।
सामाजिक तथा आध्यात्मिक जागरण के आधारशिला से आज छत्तीसगढ़ में सतनाम पंथ के लाखों अनुयायी हैं।
छ.ग. शासन ने उनकी स्मृति में सामाजिक चेतना/दलित उत्थान के क्षेत्र में गुरू घासीदास न्याय के क्षेत्र में गुरू घासीदास सम्मान स्थापित किया है।
2. शहीद वीरनारायण सिंह Martyr/ Shaheed Veer Narayan Singh
1857 के स्वतंत्रता-संग्राम में मातृभूमि के लिए मर मिटने वाले शहीदों में छत्तीसगढ़ के आदिवासी जन-नायक, वीरनाराण सिंह का नाम सर्वाधिक प्रेरणास्पद है।
पिता की मृत्यु के बाद वीरनारायण सिंह सोनाखान के जमींदार बने। परोपकारी, न्यायप्रिय तथा कर्मठ शासन होने के कारण अंचल के लोगों से मिलते तथा उनकी उचित सहायता करते थे।
1854 में अंग्रेजी राज्य में विलय के बाद नए ढंग से टकोली नियत की गई जिसका विरोध किया गया, इससे रायपुर की डिप्टी कमिश्नर इलियट उनके घोर विरोधी हो गये।
1856 में छत्तीसगढ़ भीषण सूखे की चपेट में आ गया। लोग दाने-दाने को तरसने लगे, लेकिन कसडोल के व्यापारी माखन का गोदाम अन्न से भरा था।
कहने पर भी जब व्यापारी अनाज देने को तैयार नहीं हुआ तो उन्होंने अनाज भंडार के ताले तुड़वा दिये। व्यापारी की शिकायत पर इलियट ने वीरनारायण सिंह के विरुद्ध वारंट जारी कर 24 अक्टूबर 1856 को संबलपुर से गिरफ्तार कर लिया गया।
वीरनारायण सिंह 28 अगस्त, 1857 को अपने तीन साथियों सहित जेल से भाग निकले और सोनाखान पहुंच कर 500 बंदूकधारियों की सेना बनाई और अंग्रेजों के विरुद्ध जबरदस्त मोर्चाबंदी कर करारी टक्कर दी। भीषण संघर्ष के बाद अंग्रेजों ने कूटनीति से कैद कर मुकदमा चलाया और 10 दिसम्बर, 1857 को फांसी दे दी गई।
अन्याय के खिलाफ सतत् संघर्ष का आव्हान, निर्भीकता, चेतना जगाने और ग्रामीणों में उनके मौलिक अधिकारों के प्रति जागृति उत्पन्न करने के प्रेरक कार्यों को दृष्टिगत रखते हुए छत्तीसगढ़ शासन ने उनकी स्मृति में आदिवासी एवं पिछड़ा वर्ग का उत्थान के क्षेत्र में शहीद वीर नारायण सिंह सम्मान स्थापित किया है।
मेला Mela in Baloda Bajar
1. दामाखेड़ा मेला
कबीर पंथियों की धर्म स्थली “दामाखेड़ा” में प्रसिद्ध मेला प्रतिवर्ष माघमूर्णिमा में लगता है।
ब्रिटिश शासन के अन्तर्गत प्रमुख विद्रोह एवं क्रांति
1. सोनाखान विद्रोह (1856)
स्थान – सोनाखान, जिला-बलौदाबाजार
नेतृत्व – वीरनारायण सिंह (सोनाखान के जमींदार)
विरुद्ध – अकाल के दौरान सरकार के दमनकारी नीतियों के विरूद्ध
कारण – कसडोल के माखनलाल नामक व्यापारी के गोदाम से अनाज लूटकर अकाल पीड़ितों को बाँटना
गिरफ्तार – 02 दिसम्बर, 1857 में कैप्टन स्मिथ ने सोनाखान से भटगाँव, बिलाईगढ़, देवरी एवं कटंगी के जमींदारों ने अंग्रेजों का साथ दिया।
फाँसी – 10 दिसम्बर, 1857 को रायपुर के जयस्तंभ चौक में।
तात्कालिक अधीक्षक – चार्ल्स इलियट।
वीरनारायण सिंह छत्तीसगढ़ स्वतंत्रता आंदोलन के प्रथम शहीद.
कृषि व सिंचाई agriculture and irrigation Balodabazar
बलौदा बाजार जिले की छ: तहसीलों के अंतर्गत कृषि का कुल रकबा 269888 हेक्टेअर है। जिले में धान की फसल प्रमुखता से बनाई जाती है। जिले के 970 गांव की 10 लाख से ज्यादा आबादी में से अधिकांशत: लोग कृषि पर ही आश्रित है।
समर्थन मूल्य पर 86 सहकारी समितियों के माध्यम से धान क्रय किया जाता है। जिले में 4 कृषि उपज मंडिया भी है, जिनमें भाटापारा सिथत मंडी वर्ष भर फसल क्रय विक्रय के लिए प्रसिद्ध है।
सिंचाई हेतु जिले में अनेक नदी, नाले सिथत है, जिनमें महानदी, शिवनाथ, जोंक प्रमुख नदियां है। सहायक नदियों में बालमदेयी है वहीं जमुनिया व खोरसी नाला भी प्रमुख है।
बि्रटिश काल में सिंचार्इ सुविधा को विकसीत करने हेतु 1935-36 में लगभग 200 कि.मी. नहरों का जाल बिछाया गया। बलौदा बाजार शाखा नहर व लवन शाखा नहर के माध्यम से गंगरेल बांध का पानी आज भी खेतों मेें पहुंचाया जाता है।
शासन द्वारा औसत वर्षा में कमी के चलते बलौदा बाजार को वृषिटछाया क्षेत्र घोषित किया गया है। केवल पलारी तहसील ही सिंचीत क्षेत्र है शेष तहसीलों में सिंचित क्षेत्र का रकबा कम है।
कसडोल क्षेत्र में विशालकाय बलारडेम के अलावा जल संसाधन विभाग द्वारा नदियाें में एनिकेट व कुछ अन्य छोटे बांध भी निर्मित कराये गये हैं।
भाटापारा नहर का निर्माणकार्य विगत कई वर्षो सें जारी है, जिसके पूर्ण होने से जिले का भाटापारा तहसील भी सिंचार्इ सुविधा से परिपूर्ण हो जावेगा।
वन Forest Balodabazar
जिले की कसडोल तहसील वनाच्छादित है। जिसमें जिले का 875.27 हेक्टेअर वन क्षेत्र है। जहां वनस्पतियों एवं पशु-पक्षियों की विभिन्न प्रजातियां बड़ी संख्या में पार्इ जाती है।
कसडोल तहसील के अंतर्गत ही बारनवापारा अभ्यारण सिथत है, जहां पर्यटन विभाग द्वारा मोटल का निर्माण कराने के अलावा जंगल सफारी की व्यवस्था भी की गर्इ है। इसके अलावा सोनबरसा, खैरवारडीह (बलौदा बाजार), धमनी, धाराशिव (पलारी), कचलोन (सिमगा), सुमा (भाटापारा) के सुरक्षित वन है।
खनिज एवं उधोग minerals and industry Balodabazar
बलौदा बाजार जिले में चुना-पत्थर ही प्रमुख खनिज है। सिमगा तथा बलौदा बाजार तहसील में यह खनिज पाया जाता है।
इसके कारण यहां सीमेन्ट संयंत्रों की बहुतायत है, जिनमें ग्राम हिरमी व रावन में अल्ट्राटेक, ग्राम रवान में अम्बुजा, ग्राम सोनाडीह में लाफार्ज जैसे अन्तराष्ट्रीय संयंत्र स्थापित है।
इसके अलावा ग्राम रिसदा में इमामी तथा भरूवाडीह में श्री सीमेन्ट संयंत्र प्रस्तावित है। कसडोल तहसील स्थित सोनाखान के बघमरा गांव में स्वर्ण चूर्ण पाये जाने की पुष्टि भी हुर्इ है, किंतु उत्पादन लागत अधिक होने के चलते इस दिशा में आपेक्षित प्रगति नहीं हुर्इ।
बिलार्इगढ़, कसडोल तहसील तथा सिमगा में बुनकरों द्वारा हथकरघा से साडि़यों व अन्य वस्त्रों का निर्माण भी किया जाता है। बलौदा बाजार, भाटापारा में अनेक रार्इस मिल, दाल मिल, पोहा मिल संचालित है।
यहां का चावल विदेशों में भी निर्यात किया जाता है साथ ही पावर प्लांट, पीतल कारखाना व अन्य लघु व मध्यम उधोग भी संचालित है। जिला निर्माण पश्चात औधोगिक पार्क की स्थापना से नए उधोग की संभावना बलवती हुर्इ है।
· 10-11वीं शताब्दी का है मंदिर
नारायणपुर के इस प्राचीन शिव मंदिर के 10वीं-11वीं शताब्दी में निर्मित होने का अनुमान लगाया जाता है क्योंकि खरौद में पाए गए शिलालेख (1181 ई.) के अनुसार हैहयवंशीय राजाओं ने यहां पर एक भव्य उद्यान का निर्माण कराया था।
मंदिर का निर्माण रात के समय किया गया ग्राम नारायणपुर एवं आसपास के बड़े बुजुर्गों के अनुसार इस मंदिर का निर्माण रात्रि के समय किया गया तथा निर्माण कार्य लगभग 6 महीने तक लगातार चला.
इस मंदिर के निर्माणकर्ता प्रधान शिल्पी का नाम ग्रामीण नारायण बताते हैं जो जनजाति समुदाय का था तथा उसी के नाम इस गांव का नामकरण भी किया गया।
· मंदिर में कलश नहीं लग पाया
किसी भी हिन्दू देवालय एवं मंदिर की पूर्णता तभी मानी जाती है जब उसके कंगूरे पर कलश स्थापित हो जाए, परंतु इस मामले में नारायणपुर का प्राचीन शिव मंदिर अलग है। क्योंकि इस मंदिर के कंगूरे में आज तक कलश स्थापित नहीं हो पाया है।
इस संबंध में किवदंति के अनुसार प्रधान शिल्पी नारायण रात्रि के समय पूर्णत: निर्वस्त्र होकर मंदिर निर्माण का कार्य करते थे तथा उसके लिए उनकी पत्नी भोजन लेकर निर्माण स्थल पर आती थी।
मंदिर का शिखर निर्माण अंतिम आ गया था तभी एक दिन किसी कारणवश उनकी पत्नी के स्थान पर उसकी बहन भोजन लेकर आ गई जिसे देखकर पूर्णत: नग्न अवस्था में नारायण का सिर शर्म से झूक गया और उसने मंदिर के कंगूरे से नीचे कूदकर अपना प्राणोत्सर्ग कर दिया।
· भाई-बहन एक साथ नहीं जाते मंदिर
गांव में प्रचलित किंवदंति के अनुसार मंदिर के प्रधान शिल्पी नारायण एवं उसकी बहन के किस्से सुनने के बाद इस प्राचीन मंदिर में पूजन दर्शन हेतु भाई-बहन एक साथ नहीं जाते.
भाई-बहन का एक साथ नहीं जाने का प्रमुख कारण दीवारों पर उकेरी गई मैथुन मूर्तियों को भी माना जाता है। आदिवासी समाज का लगता है
3 दिनी मेला ऐतिहासिक-पुरातात्विक एवं धार्मिक महत्व के इस गांव में शिल्पकार नारायण को अपने पूर्वज मानने वाले कंवर (पैकरा) आदिवासी समाज द्वारा यहां पर प्रतिवर्ष चैत्र शुक्ल त्रयोदशी से पूर्णिमा तक तीन दिवसीय मेला लगता है
जिसमें बलौदाबाजार, रायपुर, महासमुंद, बिलासपुर, जांजगीर-चांपा एवं रायगढ़ जिले के कंवर समाज के लोग आते हैं। इस मेले में करमा, ददरिया, सुआ नृत्य सहित आदिवासी संस्कृति से जुड़े नृत्य कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
मेले में शिक्षा, चिकित्सा या अन्य गतिविधियों में सर्वोकृष्ट कार्य करने वालों को समाज द्वारा सम्मानित किया जाता है।
व्यवहार न्यायालय Civil Court Balodabazar
जिले के सभी छ: तहसीलों में व्यवहार न्यायालय कार्यरत है जहां द्वितीय श्रेणी न्यायधीश हैं वहीं बिलार्इगढ़ के भटगांव तहसील में भी व्यवहार न्यायालय स्थापित है तथा पलारी तहसील में प्रस्तावित है।
शिक्षा Education in Balodabazar
बिलार्इगढ़, कसडोल, लवन, पलारी, बलौदा बाजार, भाटापारा, सिमगा, भटगांव में महाविधालय एवं बलौदा बाजार, कसडोल, हथबंध, भटगांव में आर्इटीआर्इ संचालित है।
प्रशासन Administration Balodabazar
जिले में पुलिस प्रशासन के सेटप में 3 पुलिस अनुविभाग बलौदा बाजार, भाटापारा, बिलार्इगढ़ है, जिसके अंतर्गत 12 थाने व 10 चौकियां शामिल है। जिला अन्तर्गत 3 राजस्व अनुविभाग भाटापारा, बलौदा बाजार, बिलार्इगढ़ है तथा 6 तहसीलों के अलावा 5 उप तहसील भी शामिल है।
बलौदा बाजार एवं भाटापारा नगर पालिका है जबकि सिमगा, भटगांव, बिलार्इगढ़, कसडोल, टुण्ड्रा, लवन, पलारी नगर पांचायत हैं।
चिकित्सा की दृषिट से सभी तहसीलों में सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र है तथा प्रमुख स्थानों पर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र सिथत है।
आज से असितत्व में आने वाला बलौदा बाजार जिला को सड़क एवं परिवहन सुविधा, कृषि व सिंचार्इ सुविधा, शिक्षा, उधोग धंधे व पर्यटन के मामले में नवगठित अन्य जिलों की अपेक्षा अग्रणी कहा जाना अतिश्योकित नहीं होगा।
अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां Baloda Bazar News
1860 में पुलिस थाने की स्थापना, 1914 में अनुविभागिय अधिकारी राजस्व, िंचार्इ व मुंसीफ न्यायालय की स्थापना, 1919 में व्यवहार न्यायालय की स्थापना, 1920 में कोआपरेटिव बैंक की स्थापना,
1928 में दशहरा मैदान में अंग्रेजों द्वारा आफिसर्स क्लब का निर्माण, 26 नवम्बर 1933 में कृषि उपज मंडी प्रांगण में महात्मा गांधी का आगमन, पूर्व वायुसेना अध्यक्ष श्री अनिल यशवंत टिपनिस का 1940 में बलौदा बाजार में जन्म,
1940-41 में प्राथमिक बालक शाला की स्थापना, 1946 में किसान रार्इसमिल की स्थापना, 1952 में शासकीय (लाल) औषधालय का शुभारंभ तात्कालीन स्वास्थ्य मंत्री रानी पदमावति द्वारा,1953 में शासकीय बहुउद्वेशीय उ.मा.शाला,
1956 में नगर का विधुतीयकरण, 1958 में बालविहार शाला भवन का शिलान्यास तात्कालीन कृषि एवं उधोग मंत्री तखतमल जैन द्वारा किया गया। कालान्तर में यहां शासकीय कन्याशाला व औधोगिक प्रशिक्षण संस्थान प्रारम्भ हुआ।
1962-63 में महाविधालय की स्थापना जो बाद में दाऊ कल्याण सिंह महाविध़ालय के नाम से संचालित हो रहा है। 1 मार्च 1964 से कृषि उपज मंडी समिति प्रारम्भ, 21 फरवरी 1991 को उपजेल का लोकार्पण,
30 नवम्बर 1991 से जिला सत्र न्यायालय का शुभारंभ, 31 अगस्त 1998 से अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक व अतिरिक्त जिलाधीश की पदस्थापना की गर्इ। प्रथम जिलाधीश श्री राजेश सुकुमार टोप्पो, प्रथम पुलिस अधीक्षक श्री ए.एम. जूरी।
बलौदाबाजार का नामकरण के संबंध में प्रचलित कहानी के अनुसार पूर्व में यहां दुसरे राज्य के व्यापारी बैल, भैंसा (बोदा) का क्रय विक्रय करने नगर के भैंसा पसरा में एकत्रित होते थे।
जिसके फल स्वरूप इसका नाम बैलबोदा बाजार तथा कालांतर में बलौदा बाजार के रूप में प्रचलित हुआ।
Balauda Bajar
पौराणिक स्थल तुरतुरिया कहाँ स्थित है?
A. बलौदाबाजार
B. दल्लीराजहरा
C. बारसूर
D. पाटन
उत्तर- A
गिरौदपुरी का मेला कहाँ लगता है?
Ans – बलौदाबाजार
छाता पहाड़ी कहाँ स्थित है?
Ans – बलौदाबाजार
सुफरा मठ कहाँ स्थित है?
Ans – बलौदाबाजार
चरणकुण्ड कहाँ स्थित है?
Ans – बलौदाबाजार
अमृत कुण्ड कहाँ स्थित है?
Ans – बलौदाबाजार
लव कुश का जन्म स्थल ….है?
तुरतुरिया
संत गुरू घासीदास जी की जन्मस्थली कहाँ स्थित है?
बलौदाबाजार-भाटापारा
छत्तीसगढ़ के सपूत वीर नारायण सिंह का जन्म हुआ था? CGPSC 2020
A. सोना खान बलौदाबाजार
B. कोमाखान उड़ीसा
C. राजनांदगांव खैरागढ़
D. दुर्ग उतई
उत्तर- A


Your SuggesTion is imporTant For Us, Thank You For CommenTing, We Will bE Able To Reply To Your CommenTs As Soon as Possible.
Regard.... Chhattisgarh.xyz